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Apr 3, 2012

दिल्ली -2012

भाषा ख़त्म होने को है
और एक पूरी सभ्यता विदा लेने को
हास्‍य-विद्रूप सजे यथार्थ से संगत की
इस कीच
इस किचकिच में उतरने की
मेरी सामर्थ्य नहीं
न मुठ्ठी भर मिट्टी की चाह
दिखे कहीं साँझी जमीन
तो कहें दोस्त! 
कैफ़ियत में तकल्लुफ़ के सिरे नहीं
न तबीयत दानिशमंदी की कायल...
 
जाने किस नक्षत्र से झरती
पलकों पर गिरती
नींद
अपना खज़ाना ख़्वाबों का  
 
ख़्वाबों में डोलती जिप्सी परछाईयाँ
इतनी रात गए दिल के द्वार पर दस्तक
अल्लसुबह तक छाती पर नेह की थपकियाँ
कैसी तो मुहब्बतें
किस किस की मुराद
निमिष भर जादू
आने की पुख्ता वज़ह न थी
न लौट जाने की ही
रहे हम जनम के पागल ...
*****

4 comments:

  1. बहुत गहरी ..डीप..डिप..डिप.. पढ़ने बाद!!

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  2. काव्य प्रतिक्रिया :)

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  3. जाने किस नक्षत्र से झरती
    पलकों पर गिरती
    नींद
    अपना खज़ाना ख़्वाबों का
    ख़्वाबों में डोलती जिप्सी परछाईयाँ
    इतनी रात गए दिल के द्वार पर दस्तक
    अल्लसुबह तक छाती पर नेह की थपकियाँ ...

    ख्वाबो के इस खजाने से काश कभी भी जागना न पड़े ... इन थपकियों का सिलसिला यूं ही चलता रहे ...

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